#Rafel_offset_partner
राफ़ेल डील में सबसे संशय उत्पन्न करने वाला विषय जो कोर्ट के रूलिंग के बावजूद भी बार बार उठाया जा रहा है वो है रिलायंस का ऑफ़सेट पार्ट्नर होना। राहुल ग़ाँधी फिर से हवा बना रहे हैं कि HAL को कॉंट्रैक्ट नहीं मिला, रिलायंस को मिल गया।
केंद्र सरकार ने पहले भी कई बार साफ़ किया है कि राफ़ेल विमान पूर्णतया फ़्रान्स से इम्पोर्ट होने हैं, HAL या रिलायंस से इसका कोई लेना देना नहीं है। इसका एक सिंगल नट बोल्ट भी रिलायंस को नहीं बनाना। तो कॉंट्रैक्ट रिलायंस को मिल गया, ये बात ही बकवास है। रिलायंस सिर्फ़ एक ऑफ़सेट पार्ट्नर हैं, जिसे ख़ुद Dessault ने चुना है।
अब इस ऑफ़सेट पार्ट्नर के नाम पर हर जगह अफ़वाह व संशय फैलाया जा रहा है। समझते हैं कि क्या होता है ये ऑफ़सेट पार्ट्नर?
फ़्रान्स भारत को 59000 करोड़ का आयुध सामग्री (राफ़ेल) दे रहा है, इससे हमारा व्यापारिक घाटा (trade deficeit) बढ़ेगा। इस घाटे की क्षतिपूर्ति के लिए डिफ़ेंस डील में offset clause होता है जिसके तहत भारत में आयुध सामग्री सप्लाई करने वाले देश को भारत से भी यहाँ का बना सामान ख़रीदना होता है वो भी न्यूनतम डिफ़ेंस डील के आधे मूल्य का, जिससे भारत के व्यापारिक घाटे की क्षतिपूर्ति हो सके और डिफ़ेंस डील का अर्थव्यवस्था में पड़ने वाले नकारात्मक असर को कम किया जा सके।
ये clause ये सुनिश्चित करता है कि आयुध सामग्री बनाने व सप्लाई करने वाले देश दूसरे देशों में युद्ध करवाकर उसकी अर्थव्यवस्था ख़राब करने से परहेज़ करेंगे, क्योंकि जब वो किसी देश में आयुध सामग्री export करेंगे तो उन्हें उस देश से इम्पोर्ट करने की बाध्यता भी होगी।
इस प्रकार फ़्रान्स को कम से कम 30000 करोड़ का माल भारत से ख़रीदना होगा। अब ये माल क्या होगा, वो फ़्रान्स का चुनाव होगा। वो चाहे तो यहाँ से गेहूँ, चावल, मसाले, कच्चा माल इम्पोर्ट कर ले। या फिर कोई कम्पनी खोलकर अपने technical specification का माल उत्पादन करे और उस माल को भारत से फ़्रान्स एक्सपोर्ट करे।
यदि फ़्रान्स भारत में कोई कम्पनी खोलकर भारतीय संसाधनों (मैन एंड मटीरीयल) से उत्पादन कर अपने देश एक्सपोर्ट करता है, तो भारतीय संसाधनों के प्रबंधन के लिए उसे भारतीय पार्ट्नर की ज़रूरत होगी, जिसे offset पार्ट्नर कहते हैं। और ऐसी कम्पनी offset कम्पनी कहलाएगी।
फ़्रान्स को भारत से offset के तौर पे इलेक्ट्रॉनिक आइटम, जेट इंजन, जेट विमान वैगरह चाहिए, वो भारत के सस्ते संसाधनों कि इस्तेमाल करके अपनी तकनीकी ज़रूरतों के हिसाब से बनाना चाहती है।
इसके लिए Dessault ने कई भारतीय कम्पनियों के साथ मिलकर joint venture (JV) कम्पनी बनाने की दिशा में कार्य शुरू किया।
वो इसके लिए क़रीब 100 भारतीय कम्पनियों से बात कर रहे हैं जैसे कि BEL (Bharat Electronics Limited, CPSU), DRDO (Defence Research & Development Organisation), HAL (Hindustan Aeronautics Limited), Larsen & Toubro (L&T), Reliance Defence आदि! और 30 भारतीय कम्पनियों से साथ के साथ उनकी बात पक्की भी हो चुकी है जिसमें रिलायंस डिफ़ेस भी एक है।
हैरानी ये है कि 29 कम्पनियों के नाम छोड़कर केवल रिलायंस डिफ़ेंस का नाम उछाला गया। जबकि 30000 करोड़ का केवल 3% आपूर्ति ही रिलायंस के साथ बने JV कम्पनी से होनी है जो Falcon executive jet बनाएगी जिसका तकनीकी ज्ञान Dessault देगा और रिलायंस डिफ़ेंस उसे भारतीय संसाधन उपलब्ध कराएगी। दूसरे Falcon executive jet का राफ़ेल से कोई सम्बंध नहीं है, राफ़ेल अलग उत्पाद है जो फ़्रान्स से भारत इम्पोर्ट होना है और Falcon executive jet अलग उत्पाद है जो यहाँ से फ़्रान्स export किया जाएगा। विचित्र बात ये हैं कि 29 offset पार्ट्नर पर कहीं ख़बर नहीं आ रही है।
मालूम हो कि 30000 करोड़ offset value का एक बड़ा हिस्सा Bharat Electronics Limited (जो कि भारत सरकार की कम्पनी है) के साथ बने JV से आपूर्ति की जानी है। बाक़ी DRDO और HAL जैसे सरकारी संगठनों के साथ भी Dessault JV बना रहा है। Dessault DRDO के साथ मिलकर कावेरी जेट इंजन प्रोग्राम जो कभी अधूरी रह गई थी, उसे आगे बढ़ाएगा।
इस offset के वजह से भारत के व्यापारिक घाटे की क्षतिपूर्ति तो होगी ही, इसके अलवा देश में ऐसी कई स्वदेशी डिफ़ेंस की कम्पनियाँ नई बनेगी जिन्हें अपने JV पार्ट्नर Dessault के expertise व technical knowledge का लाभ मिलेगा।
तो ये थी offset partner की जानकारी जिसे तोड़ मरोड़ के अर्थ का अनर्थ किया गया।
कहने का मतलब यदि एक ही झूठ बार बार चलाया जाए तो वो सच लगाने लगता है, राफ़ेल विवाद बस इतना ही है जिसमें राहुल ग़ाँधी के साथ साथ मीडिया भी बराबर की भागीदार है!
🙏जय श्री राम 🙏
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