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Wednesday, 26 August 2015

OROP

क्या मतलब है 'वन रैंक वन पेंशन' का ?  By  रविकांत/संवाददाता, एबीपी न्यूज़ 

नई दिल्ली: वन रैंक वन पेंशन पर काफी बवाल मचा हआ है. यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर मोदी सरकार घिरती नज़र आ रही है. मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब खुद पूर्व सेना प्रमुख और बीजेपी के सांसद वीके सिंह की बेटी ने वन रैंक वन पेंशन से जुड़े विरोध प्रदर्शन से खुद को जोड़ लिया. जंतर-मतंर पर पूर्व फौजी इसी मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन पर डटे हुए हैं.

क्या आपको पता है कि क्या है वन रैंक वन पेंशन का पूरा बवाल!
दरअसल जब दो फौजी एक पद पर, एक समय तक सर्विस कर के रिटायर होते हैं पर उनके रिटायरमेंट में कुछ सालों का अंतर होता है और इस बीच नया वेतन आयोग भी आ जाता है, तो बाद में रिटायर होने वाले की पेंशन नए वेतन आयोग के अनुसार बढ़ जाती है. लेकिन पहले रिटायर हो चुके फौजी की पेंशन उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाती.

कहां फंसा है पेंच-
फौजियों की पेंशन की तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती क्योंकि एक ओर जहाँ सामान्य सरकारी कर्मचारी को 60 साल तक तनख्वाह लेने की सुविधा मिलती है, वहीं फौजियों को 33 साल में ही रिटायर होना पड़ता है और उनकी सर्विस के हालात भी अधिक कठिन होते हैं.

अंग्रेजों के ज़माने से अबतक ऐसा रहा है चलन-
अंग्रेजों के समय में फौजियों की पेंशन तनख्वाह की करीब 80 प्रतिशत होती थी जबकि सामान्य सरकारी कर्मचारी की 33 प्रतिशत हुआ करती थी. भारत सरकार ने इसे सही नहीं माना और 1957 के बाद से फौजियों की पेंशन को कम की और अन्य क्षेत्रों की पेंशन बढ़ानी शुरू की.

क्या है फौजियों की मांग-
फौजियों की मांग है कि 1 अप्रैल 2014 से ये योजना छठे वेतन आयोग की शिफरिशों के साथ लागू हो. फौजियों का कहना है कि असली संतुलन लाना है तो हमें भी 60 साल पर रिटायर किया जाय. हमें तो 33 साल पे ही रिटायर कर दिया जाता है और उसके बाद सारा जीवन हम पेंशन से ही गुजारते हैं. जबकि अन्य कर्मचारी 60 साल तक पूरी तनख्वाह पाते हैं. ऐसे में हमारी पेंशन के प्रतिशत को कम नहीं करना चाहिए. 

बहरहाल इस वक्त ये फौजी सिर्फ इतना ही चाहते हैं कि छठे वेतन आयोग को लागू करते हुए समान पद और समान समय तक सर्विस कर चुके फौजियों को एक समान पेंशन दी जाय, चाहे दोनों किसी भी साल में रिटायर हुए हों. अगर ये योजना लागू होती है तो करीब 25 लाख फौजियों या उनके परिवारों को लाभ होगा. इसके लिए हर साल सरकार को करीब 9 हज़ार करोण रुपये का अतिरिक्त भार सहना होगा.

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