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Thursday, 6 April 2017

अपने ही पूर्व सैनिकों से जंग लड़ रही है सरकार !


Kiran Kumari Wednesday, April 5, 2017
सरकार देश की सेवा करने वाले पूर्व दिव्यांग सैनिकों के खिलाफ ही सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ रही है और इसमें उसे नाकामी भी मिल रही है।

अपने ही पूर्व सैनिकों से जंग लड़ रही है सरकार! नवभारत टाइम्स 
नई दिल्ली
सरकार देश की सेवा करने वाले पूर्व दिव्यांग सैनिकों के खिलाफ ही सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ रही है और इसमें उसे नाकामी भी मिल रही है। जानकार बताते हैं कि राजनीतिक नेतृत्व भी यह सिलसिला खत्म होते देखना चाहता है, इसके बावजूद यह खत्म नहीं हो रहा है। वे इसके पीछे ब्यूरोक्रैसी को जिम्मेदार मानते हैं।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पूर्व दिव्यांग सैनिकों के खिलाफ 2014 से 2016 के बीच करीब 794 अपील दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कुल अपीलों में से दिव्यांग सैनिकों के खिलाफ दाखिल अपीलों की संख्या 61.5 पर्सेंट थी, जिनमें सिर्फ एक अपील में फैसला सरकार के पक्ष में गया था। सरकार से हाल में इस बारे में संसद में सवाल पूछा गया था, जिसके जवाब में सरकार ने बताया कि हमने रक्षाकर्मियों के खिलाफ केस घटाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें दिव्यांग सैनिकों के मामले भी शामिल हैं। सरकार के इस जवाब से पूर्व सैनिक संतुष्ट नहीं है।
सरकार आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट के उन फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करती रही है, जो दिव्यांग पूर्व सैनिकों के पक्ष में आते रहे हैं। पूर्व सैनिकों की ज्यादातर शिकायतें पेंशन और उससे जुड़े लाभों को लेकर रही है। इस तरह के केस लड़ने वाले एक वकील का मानना है कि सैनिक फिट कंडीशन में भर्ती होते हैं, इसलिए उनके दिव्यांग होने की स्थिति सेवा के दौरान ही आती है। लेकिन उन्हें दिव्यांग होने पर मिलने वाले लाभों को कई दलीलों के जरिए वंचित कर दिया जाता है। कई बार महज कुछ हजार की रकम के लिए भी ऐसे पूर्व सैनिकों के खिलाफ अपील दाखिल की जाती है।

कई सांसदों और पूर्व सैनिक संगठनों ने इस मामले को सरकार के सामने उठाया है। इस तरह के तमाम मामले वापस लेने की भी सलाह दी गई। पिछले करीब दो साल के दौरान रक्षा मंत्री रहे मनोहर पर्रिकर ने पीएम के निर्देश पर इस समस्या को सुलझाने के लिए पहली बार कमिटी बनाई। इस कमिटी ने 2015 में रिपोर्ट दी थी, जिसे 2016 में आम कर दिया गया था, लेकिन समस्या सुलझी नहीं। करगिल की जंग में अपना पैर खोने वाले मेजर डीपी सिंह भी इस कमिटी से जुड़े थे। उन्होंने बताया कि 4 मार्च को मनोहर पर्रिकर से मेरी मुलाकात हुई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि इस पर अमल मेरी सबसे अहम जिम्मेदारी है। अमल पर 8 अप्रैल से मेरी अध्यक्षता में हर हफ्ते बैठक होगी। 4-5 हफ्ते में अमल कराने की कोशिश होगी।

मनोहर पर्रिकर जहां अब गोवा के मुख्यमंत्री बन चुके हैं, वहीं डीपी सिंह ने बताया कि कमिटी की रिपोर्ट में वही बातें कही गई हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुका है। लेकिन एक शख्स जिस मुद्दे पर केस जीत चुका है, दूसरे शख्स को सरकार उसी आधार पर लाभ देने के लिए तैयार नहीं है। इस मामले में सरकारी मुलाजिम ही सरकार के खिलाफ रास्ते पर जा रहे हैं।

इस कमिटी के एक अन्य सदस्य और सीनियर वकील मेजर नवदीप सिंह ने कहा कि राजनेता और हायर ब्यूरोक्रैसी इस तरह की गलत अपीलों को दाखिल करने के पक्ष में नहीं है। इसका विरोध करने वाले लोअर ब्यूरोक्रैसी के लोग हैं। वे हायर ब्यूरोक्रैसी और राजनेताओं के पकड़ में नहीं आ रहे हैं। मेरा मानना है कि जो हायर ब्यूरोक्रैसी और राजनेता नीतिनिर्माता हैं और उन्हें कड़ाई से अपनी इच्छाशक्ति को लागू करना चाहिए।



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