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Sunday, 15 April 2018

*।। कोई अर्थ नहीं।।*

*राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर*
*।। कोई अर्थ नहीं।।* 
नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं*।।

     जब फसल सूख कर जल के बिन
     तिनका -तिनका बन गिर जाये,
     फिर होने वाली वर्षा का
     *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

     छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
     निकले जाते हैं रोज़ जहाँ, 
     फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
     *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

मन कटुवाणी से आहत हो 
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

     सुख-साधन चाहे जितने हों
     पर काया रोगों का घर हो,
     फिर उन अगनित सुविधाओं का
     *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

:::बहुत सुंदर मार्मिक ह्रदयस्पर्शी कविता

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